Saturday, 12 November 2016

प्रेम करता
पर जताता नहीं
पिता है वोह

सर्द मौसम
सोता मैं सकून से
धूप की गोद

बिन मुखाग्नि
चिंताएं जला रही
इंसानी चिता


टांकती भोर
दूब के गलीचे पे
ओस के मोती

कटे दरख़्त
टूट कर बिखरे
नंगे पहाड़

संभाल रखे
डायरी गुल्लक में
गीतों के सिक्के

Monday, 1 August 2016

उम्र

वक़्त दीमक
चाटे दिन ब दिन
शाख उम्र की

खर्च हो रहे
ज़िंदगी गुल्लक से
उम्र के साल

वक़्त की आंधी
संग उड़ा ले जाती
उम्र के पत्ते

उम्र का घड़ा
बूंद बूंद रिसता
खाली हो रहा

करती वार
काटे उम्र के साल
वक़्त कटार

चुगती जाये
समय की चिड़िया
उम्र के दाने

खूब सेक ली
अब ढलने लगी
उम्र की धूप

ज़िंदगी रेल
भागे जब तक है
उम्र का तेल

सिक्के उम्र के
कब खर्च हो गए
पता ना चला

उसने दिये
गुल्लक मे सबको
गिन के सिक्के

जीवन दीप
धडकनों का तेल
साँसों की बाती

कब फूटेगा
बुलबुला प्राणो का
कौन जानता

उम्र दरख़्त
गिरता एक पत्ता
हरेक साल
रिश्ते

घायल पड़ा
शब्दों के बाणों पर
रिश्तों का भीष्म

गिरी किताब
उठा के उसने दी
बनाए रिश्ते

ठेस ना लगे
ये रिश्तो की दीवारें
कच्ची बहुत

बहा ले जो तू
दो अश्क पछतावा
जी उठें रिश्ते

तोड़ते दम
फंसे स्वार्थ जाल में
आपसी रिश्ते

रिश्तों के धागे
संभाल न पाएंगें
झूठ का भार

डूब ही गई
मतलबी नदी मे
रिश्तों की नाव

शब्दों की चोट
बिवाई से दुखते
रिश्तों के पाँव

बुने हैं रिश्तों
ले विश्वास का ताना
प्यार का बाना

जा कर दूर
आ गया और पास
अपनों के मैं

रिश्ते रेशम
पड़े गाँठ इनमें
फिर ना खुले

तकरार से
जल जाते हैं रिश्ते
बिन आग के

कहाँ खो गया
आपस का लगाव
वो साँझा चूल्हा
उम्र

वक़्त दीमक
चाटे दिन ब दिन
शाख उम्र की

खर्च हो रहे
ज़िंदगी गुल्लक से
उम्र के साल

वक़्त की आंधी
संग उड़ा ले जाती
उम्र के पत्ते

उम्र का घड़ा
बूंद बूंद रिसता
खाली हो रहा

करती वार
 काटे उम्र के साल
वक़्त कटार

चुगती जाये
समय की चिड़िया
उम्र के दाने

खूब सेक ली
अब ढलने लगी
उम्र की धूप

ज़िंदगी रेल
भागे जब तक है
उम्र का तेल

सिक्के उम्र के
कब खर्च हो गए
पता ना चला

उसने दिये
गुल्लक मे सबको
गिन के सिक्के

जीवन दीप
धडकनों का तेल
साँसों की बाती

कब फूटेगा
बुलबुला प्राणो का
कौन जानता

उम्र दरख़्त
गिरा दे एक पत्ता
हरेक साल
बारिश और नदी

हो गई जवाँ  
पी वर्षा का अमृत
बूढी नदिया

पड़ी फुहार
भागी तोड़ बंधन
नदी की धार

मरती नदी
पी वर्षा संजीवनी
फिर जी उठी

गिरी बारिश
बन पानी के बीज
उगी नदियां
बच्चों का घर

शैतानी भरा
किलकारी से गूंजे
बच्चों का घर

 बच्चों का घर
जूते बस्ता कपडे
बिस्तर पर

बच्चों का घर
दीवारों पे उभरें
बच्चों के ख्वाब

निंदिया आयी
चला ख्वाबों के देश
बच्चो का घर

कोई सामान
ना अपनी जगह
बच्चों के घर

घर आँगन
बना खेल मैदान
बच्चों का घर 
खुदगर्ज़

रखा गर्भ मे
सींचा खुद खून से
सहे हैं कष्ट

जन्म फिर दे
क्या क्या न सहा
पाला है तुझे

सीने से लगा
जगती रात भर
फिर भी खुश

खुद ना खाये
पीलाती रहे दूध
पेट भरके

हाथ पकड़
चलना है सिखाया
आगे बढ़ाया

अच्छे से अच्छा
तुझ को है खिलाया
खुद न खाया

अच्छे संस्कार
दिये तुझ को सारे
जीना सिखाया

खुदगर्ज़ तू
दो वक़्त की रोटी भी
खिला ना पाया

Sunday, 17 July 2016

                  इन्द्रधनुष
                                                1
संग बरखा
इन्द्रधनुषी पुल
बनाये धूप
2
रंगे आकाश 
इन्द्रधनुषी रंग
बरखा धूप
3
बनाया चित्र
बादलों ने धूप संग
इन्द्रधनुषी
4
बिखेरे छटा
धूप वर्षा के बाद
इन्द्रधनुषी
5
लिखे पैगाम
बादल पे धूप ने
इन्द्रधनुषी
6

गोरी की काया
रंग गया फागुन
इन्द्रधनुषी
7
प्रेम की पीर
जगाती है जज्बात
इन्द्रधनुषी
8
रवि किरनें 
उतरती सीड़ियां 
इन्द्रधनुषी

9जिंदगी तेरी 
छोटी सी है जी इसे 
इन्द्रधनुषी
10
रोज उमडें
ख्वाब इंद्रधनुषी
नींद में मेरी 
                    गर्मी
गर्मी इतनी
नदियों को भी हुयी
पानी की कमी

उमस गर्मी
दोनों सगी बहनें
ले लेती जान

पसीने संग
टपक रहा दम
गर्मी भीषण

गर्मी बहुत
गुलाम हुए हम
बत्ती के देखो

धूप का खौफ
हुये पेड़ भी तंग
ढूंढें वो छांव  

बिन बारिश
जलती दोपहर
मन उदास

धरती त्रस्त
पशु पंछी मानव
ढूंढते जल

काला हो गया
जल कर धूप में
कागा बेचारा

कर जाता है
कोलतारी बदन

जेठ महीना
बादल


जुल्फें झटकें
फुहार बरसाएं
देखो घटाएं

बादल आओ
सूर्य बहुत  गर्म
पर्दा लगाओ

चली बदरी
संग बादल दूल्हे
नैना बरसे

बारिश आई
छाता कुनमुनाया
क्यों नींद तोडी

ज्यों ही बादल
बिजली चमकाए
घटा बरसे

जंगली मेघ
पहाडो पर  उगे
बरसे नहीं

बादल गरजा
डर गई बारिश
फिर ना बरसी

सावन भादो

मर गया प्यासा
मेघा बरसो

सूखा ही सूखा
मेघ है परेशान
बरसूँ कंहा

झोली फैलाये 
खड़ी हुयी धरती
बरसो मेघ


नदी नालों को
बांटती है जवानी 
ये बरसात 


आसमान में
  
ऐसे दिखते मेघ
बहा हों  दूध

बिन बारिश
घर की छत पर
चिडिया प्यासी

धूप उतरी
सूख गयी नदियाँ
बरसो मेघ

उठो बादल
बिजलियाँ कड़के
बरस जाओ

सुर सजाती
फुहारें बारिश की
झूमते वृक्ष

दूध बहा हों
बादल दिखें ऐसे
आसमान में


कुंए मुंडेर 
प्यासा बैठा है पंछी 
बरसो मेघ 

Wednesday, 6 July 2016

रात


बोये सितारे
अम्बर पे रात ने
सूरज उगा

जागी सुबह
देख भोर का तारा
सो गई रात

पूनो की रात
चांदनी उतरती
तारों की सीढ़ी

रात परोसे
अम्बर की थाली में
चाँद की रोटी

पी रही रात
चंदा के सकोरे से
चांदनी जाम

आया सूरज
समेट चाँद तारे
चल दी रात

Tuesday, 5 July 2016


साँसों की तार
दिखाए करतब
ज़िंदगी नटी

काट डालेगा
दरख्तों के संग तू
साँसों की डोर

कागजी नाव
बरसात का पानी
बच्चे मल्लाह



अंकुर उगा
पा धरती का प्यार
दरख़्त बना


झुर्री में दबी
पर फींकी न पड़ी
माँ की मुस्कान


रिश्तों की रेत
पाके प्यार की नमी
चिपकी रहे

रोज़ बदलें
हो गए आजकल
लिबास रिश्ते

हाथ उठाए
बेटा जब माँ पर
दूध लजाए

खुशी की बाढ़
बरसाती पानी में
कागजी नाव





चन्दन हुआ
अंग पिया के लग
गोरी का तन

महकी मैं तो
अंग पिया के लग
ज्यो रात रानी

उम्र भर को 
रंग दिया पिया ने 
प्यार रंग में 

साथ बिताये 
जो लमहे हमने 
भुलाऊँ कैसे

नैनन बाण 
करे लहुलुहान 
जियरा मोरा


Monday, 4 July 2016

थका सूरज
उतारता थकान
नदी मे नहा

सांझ की बेला
लौट रहे परिंदे
लगा है मेला

गोधूली बेला
थका हुआ सूरज
सोने को चला

लौटे परिंदे
दरख्तों की शाखाएँ
ख़ुशी से झूमें

सिंदूरी शाम
लिए रक्तिम आभा
खड़ा पलाश

दिन जो ढला
छोड़ धरती उडी
धूप की चिड़ी

Sunday, 3 July 2016

चढ़ पेड़ पे
चितकबरी धूप
पत्तों से झांके

चित्र उकेरे
चितकबरी धूप
अंगना मेरे

पसरी पड़ी
चितकबरी धूप
पेड़ों के नीचे

डर के छिपी
चितकबरी धूप
खाट के नीचे

हो गई विदा
चितकबरी धूप
दिन जो छिपा



यादें

यादों के टीले
उठाते बबंडर
बड़े हठीले

मन में उठे
यादों का बबंडर
रोंदते जाए

2
रहने ना दे
यादों के बबंडर
चैन से मुझे

3
यादों के रेले
बबंडर उडाये
जान ले जाए

4
बिखरे मोती
सुनहरी यादो के
आँखों के रस्ते


5
रिस्ते है जख्म
सुनहरी यादो के
बरसातों मे

6
सोने ना देते
ख्वाब यादो के मुझे
ठंडी रातों मे

7
यादों को लिए
जले आँसू का तेल
पलकों तले
8
बंद हैं आंखे
पर नींद न आए
याद सताये
9
धुंधला विष
तेरी यादों का फैला
जीना दूभर

10
सजा  है ये दी
तेरी यादों ने मुझे
जीऊँ न मरूँ




Nostalgia

लूट ले गया
वो बचपन मेरा
वक़्त लुटेरा

लबों पे मेरे
है अब भी मिठास
तेरे लबों की

दादी की गोदी
बहुत याद आती
नानी की लोरी

छाये अब भी
मन पटल पर
रेत के घर

बच्चे सोचते
मंदिर चढ़े लड्डू
मुझे मिलते

वर्षा दुल्हन
बैठी मेघ पालकी
हवा कहार

बूँद की आस
आयी मेघ पालकी
करे निराश

होठों का स्पर्श
वो तेरा एहसास
बढ़ाता प्यास

तेरा वो स्पर्श
डाल गया फफोले
दिल पे मेरे

तुलसी तले
क्यों जलें नहीं अब
दीप घरों में

रोक लेते हैं 
उदासियों की धूप
यादों के पर्दे

क्षितिज पार 
ये अद्भुत मिलन
धरा रवि का

ढहा देती हैं 
हकीकती आंधियां 
ख्वाबों के किले

सांझ सलोनी 
लगा मांग सिन्दूर 
सजाये ख्वाब

किसी को खुशी 
और गम किसी को 
वर्षा ने दिये

वर्षा दुल्हन
बैठी मेघ पालकी
हवा कहार

बूँद की आस
आयी मेघ पालकी
करे निराश

होठों का स्पर्श
वो तेरा एहसास
बढ़ाता प्यास

तेरा वो स्पर्श
डाल गया फफोले
दिल पे मेरे

तुलसी तले
क्यों जलें नहीं अब
दीप घरों में

रोक लेते हैं 
उदासियों की धूप
यादों के पर्दे

क्षितिज पार 
ये अद्भुत मिलन
धरा रवि का

ढहा देती हैं 
हकीकती आंधियां 
ख्वाबों के किले

सांझ सलोनी 
लगा मांग सिन्दूर 
सजाये ख्वाब

किसी को खुशी 
और गम किसी को 
वर्षा ने दिये








तोड़ लेता मैं
रोज़ ही प्रकृति से
एक कविता


खड़ा पलाश
ले कर सर पर
आग का घड़ा



चीखे चिल्लाये
फंस कर बांसों में
आवारा हवा


लूट ले गया
दरख्तो का वैभव
ये पतझड़


कोहरा आया
सुबह से सूरज
बन्दी बनाया


घरों से आई
रोटिओं की सुगंध
साँझ की बेला


गर्मी इतनी
नदियों को भी हुई
पानी की कमी


लाया बसंत
हर वृक्ष के वास्ते
नई पौशाक


बारिश पड़ी
उठा धरा घूँघट
झाँका अंकुर


बन के काल
आया है जंगल में
लक्कड़हारा


वर्षा जो गिरी
पेड़ों पर लटकीं
बूंदों की लड़ी


आई शहर
गाँव की पगडण्डी
हस्ती ही खो दी


आंधी तूफ़ान
उड़ा गरीब झुग्गी
रोये बहुत


लाँघी है सीमा
जब जब नदी ने
आया सैलाब


बूढा दरख़्त
चाहे फल नहीं दे
छाँव तो देगा


चाँद बहाये
चाँदनी की नदिया
रात नहाये


जीत के हारी
सिंधु से मिल नदी
हो गई खारी


आया चुगने
सूरज राजहंस
ओस के मोती
साँसों की तार
दिखाए करतब
ज़िंदगी नटी


पेड़ जो कटा
छाया का उस दिन 
आँचल फटा

समन्द्र नहीं
एक बूँद नदी की
प्यासा चाहता

शक धागों में
उलझ कर गिरा 
टूटा यकीन


रवि जुलाहा
किरणों के धागे से
बुने उजाला ।


भोर ने धोई
रजनी की कालस
फैला उजास ।


सूखा है कुआँ
पनघट उदास
है जेठ मास ।


लगते अच्छे
कड़कती धूप में
छाँव के धब्बे ।


करे आराम
चितकबरी धूप
पेड़ों के नीचे।


ढला जो दिन
धरती छोड़ उड़ी
धूप की चिडी ।


जल -समाधि
ले रहा सागर में
थका सूरज । 
लौटे परिंदे
दरख्तों की शाखाएँ
खुशी से झूमीं ।


बेचता तारे
चंद्रमा नभ पर
बिछा के रात।


व्योम की शय्या
ओढ़कर बादल
सूरज सोया ।