Monday, 1 August 2016

रिश्ते

घायल पड़ा
शब्दों के बाणों पर
रिश्तों का भीष्म

गिरी किताब
उठा के उसने दी
बनाए रिश्ते

ठेस ना लगे
ये रिश्तो की दीवारें
कच्ची बहुत

बहा ले जो तू
दो अश्क पछतावा
जी उठें रिश्ते

तोड़ते दम
फंसे स्वार्थ जाल में
आपसी रिश्ते

रिश्तों के धागे
संभाल न पाएंगें
झूठ का भार

डूब ही गई
मतलबी नदी मे
रिश्तों की नाव

शब्दों की चोट
बिवाई से दुखते
रिश्तों के पाँव

बुने हैं रिश्तों
ले विश्वास का ताना
प्यार का बाना

जा कर दूर
आ गया और पास
अपनों के मैं

रिश्ते रेशम
पड़े गाँठ इनमें
फिर ना खुले

तकरार से
जल जाते हैं रिश्ते
बिन आग के

कहाँ खो गया
आपस का लगाव
वो साँझा चूल्हा

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