Monday, 1 August 2016

उम्र

वक़्त दीमक
चाटे दिन ब दिन
शाख उम्र की

खर्च हो रहे
ज़िंदगी गुल्लक से
उम्र के साल

वक़्त की आंधी
संग उड़ा ले जाती
उम्र के पत्ते

उम्र का घड़ा
बूंद बूंद रिसता
खाली हो रहा

करती वार
काटे उम्र के साल
वक़्त कटार

चुगती जाये
समय की चिड़िया
उम्र के दाने

खूब सेक ली
अब ढलने लगी
उम्र की धूप

ज़िंदगी रेल
भागे जब तक है
उम्र का तेल

सिक्के उम्र के
कब खर्च हो गए
पता ना चला

उसने दिये
गुल्लक मे सबको
गिन के सिक्के

जीवन दीप
धडकनों का तेल
साँसों की बाती

कब फूटेगा
बुलबुला प्राणो का
कौन जानता

उम्र दरख़्त
गिरता एक पत्ता
हरेक साल
रिश्ते

घायल पड़ा
शब्दों के बाणों पर
रिश्तों का भीष्म

गिरी किताब
उठा के उसने दी
बनाए रिश्ते

ठेस ना लगे
ये रिश्तो की दीवारें
कच्ची बहुत

बहा ले जो तू
दो अश्क पछतावा
जी उठें रिश्ते

तोड़ते दम
फंसे स्वार्थ जाल में
आपसी रिश्ते

रिश्तों के धागे
संभाल न पाएंगें
झूठ का भार

डूब ही गई
मतलबी नदी मे
रिश्तों की नाव

शब्दों की चोट
बिवाई से दुखते
रिश्तों के पाँव

बुने हैं रिश्तों
ले विश्वास का ताना
प्यार का बाना

जा कर दूर
आ गया और पास
अपनों के मैं

रिश्ते रेशम
पड़े गाँठ इनमें
फिर ना खुले

तकरार से
जल जाते हैं रिश्ते
बिन आग के

कहाँ खो गया
आपस का लगाव
वो साँझा चूल्हा
उम्र

वक़्त दीमक
चाटे दिन ब दिन
शाख उम्र की

खर्च हो रहे
ज़िंदगी गुल्लक से
उम्र के साल

वक़्त की आंधी
संग उड़ा ले जाती
उम्र के पत्ते

उम्र का घड़ा
बूंद बूंद रिसता
खाली हो रहा

करती वार
 काटे उम्र के साल
वक़्त कटार

चुगती जाये
समय की चिड़िया
उम्र के दाने

खूब सेक ली
अब ढलने लगी
उम्र की धूप

ज़िंदगी रेल
भागे जब तक है
उम्र का तेल

सिक्के उम्र के
कब खर्च हो गए
पता ना चला

उसने दिये
गुल्लक मे सबको
गिन के सिक्के

जीवन दीप
धडकनों का तेल
साँसों की बाती

कब फूटेगा
बुलबुला प्राणो का
कौन जानता

उम्र दरख़्त
गिरा दे एक पत्ता
हरेक साल
बारिश और नदी

हो गई जवाँ  
पी वर्षा का अमृत
बूढी नदिया

पड़ी फुहार
भागी तोड़ बंधन
नदी की धार

मरती नदी
पी वर्षा संजीवनी
फिर जी उठी

गिरी बारिश
बन पानी के बीज
उगी नदियां
बच्चों का घर

शैतानी भरा
किलकारी से गूंजे
बच्चों का घर

 बच्चों का घर
जूते बस्ता कपडे
बिस्तर पर

बच्चों का घर
दीवारों पे उभरें
बच्चों के ख्वाब

निंदिया आयी
चला ख्वाबों के देश
बच्चो का घर

कोई सामान
ना अपनी जगह
बच्चों के घर

घर आँगन
बना खेल मैदान
बच्चों का घर 
खुदगर्ज़

रखा गर्भ मे
सींचा खुद खून से
सहे हैं कष्ट

जन्म फिर दे
क्या क्या न सहा
पाला है तुझे

सीने से लगा
जगती रात भर
फिर भी खुश

खुद ना खाये
पीलाती रहे दूध
पेट भरके

हाथ पकड़
चलना है सिखाया
आगे बढ़ाया

अच्छे से अच्छा
तुझ को है खिलाया
खुद न खाया

अच्छे संस्कार
दिये तुझ को सारे
जीना सिखाया

खुदगर्ज़ तू
दो वक़्त की रोटी भी
खिला ना पाया