Monday, 5 January 2015
Sunday, 4 January 2015
क्षितिज पार
अंबर धरा मिले
जन्मा सूरज
व्योम विशाल
मुट्ठी भर लेकिन
मुझे ना मिला
रोया आकाश
आज उसका चाँद
है मेरे साथ
नभ ओढ़ता
बादलों का दोशाला
ज
गी है
आस
तारों के सिक्के
चंद्रमा ने उँड़ेले
नभ चादर
आकाश छू ले
पर भू पर रख
पांव अपने
ओढ़ बादल
सोया नभ में चाँद
बुझी चांदनी
रंगा आकाश
डूबते सूरज ने
नारंगी लाल
तारों के सिक्क
चंद्रमा ने उँड़ेले
नभ चादर
चुरा के रंग
फूलों के बदन से
उडी तितली
नहा नदी मे
उतारता थकान
शाम सूरज
हवा दे ताल
नाच रही मगन
पेड़ों की डाल
होंगें फिर से
पतझड़ के बाद
दरख्त
हरे
किरने गाएं
उतर आकाश से
गीत भोर के
उंडेल रही
बादलों की मटकी
अमृत धारा
Saturday, 3 January 2015
निगल गई
झूठ की दलदल
रिश्तों की बेल
धुंध फैलाती
नभ से धरा तक
झीनी चादर
फिर से शुरू
बावन हफ़्तों तक
यात्रा धरा की
धूप वक़्त की
पिघलाती जा रही
बर्फ उम्र की
रहे ना भूखी
किसी घर बिटिया
इस साल मे
पड़े ना सूखा
ना ही मरे किसान
इस साल मे
लुटे ना फिर
धरा का कोई चाँद
इस साल मे
कर लो प्रण
बढ़े देश की शान
इस साल मे
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