चुरा के रंग
फूलों के बदन से
उडी तितली
नहा नदी मे
उतारता थकान
शाम सूरज
हवा दे ताल
नाच रही मगन
पेड़ों की डाल
होंगें फिर से
पतझड़ के बाद
दरख्त हरे
किरने गाएं
उतर आकाश से
गीत भोर के
उंडेल रही
बादलों की मटकी
अमृत धारा
No comments:
Post a Comment