Saturday, 3 January 2015

निगल गई
झूठ की दलदल
रिश्तों की बेल

धुंध फैलाती
नभ से धरा तक
झीनी चादर

फिर से शुरू
बावन हफ़्तों तक
यात्रा धरा की

धूप वक़्त की
पिघलाती जा रही
बर्फ उम्र की


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