Sunday, 3 July 2016


तोड़ लेता मैं
रोज़ ही प्रकृति से
एक कविता


खड़ा पलाश
ले कर सर पर
आग का घड़ा



चीखे चिल्लाये
फंस कर बांसों में
आवारा हवा


लूट ले गया
दरख्तो का वैभव
ये पतझड़


कोहरा आया
सुबह से सूरज
बन्दी बनाया


घरों से आई
रोटिओं की सुगंध
साँझ की बेला


गर्मी इतनी
नदियों को भी हुई
पानी की कमी


लाया बसंत
हर वृक्ष के वास्ते
नई पौशाक


बारिश पड़ी
उठा धरा घूँघट
झाँका अंकुर


बन के काल
आया है जंगल में
लक्कड़हारा


वर्षा जो गिरी
पेड़ों पर लटकीं
बूंदों की लड़ी


आई शहर
गाँव की पगडण्डी
हस्ती ही खो दी


आंधी तूफ़ान
उड़ा गरीब झुग्गी
रोये बहुत


लाँघी है सीमा
जब जब नदी ने
आया सैलाब


बूढा दरख़्त
चाहे फल नहीं दे
छाँव तो देगा


चाँद बहाये
चाँदनी की नदिया
रात नहाये


जीत के हारी
सिंधु से मिल नदी
हो गई खारी


आया चुगने
सूरज राजहंस
ओस के मोती

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