तोड़ लेता मैं
रोज़ ही प्रकृति से
एक कविता
रोज़ ही प्रकृति से
एक कविता
खड़ा पलाश
ले कर सर पर
आग का घड़ा
ले कर सर पर
आग का घड़ा
चीखे चिल्लाये
फंस कर बांसों में
आवारा हवा
फंस कर बांसों में
आवारा हवा
लूट ले गया
दरख्तो का वैभव
ये पतझड़
दरख्तो का वैभव
ये पतझड़
कोहरा आया
सुबह से सूरज
बन्दी बनाया
सुबह से सूरज
बन्दी बनाया
घरों से आई
रोटिओं की सुगंध
साँझ की बेला
रोटिओं की सुगंध
साँझ की बेला
गर्मी इतनी
नदियों को भी हुई
पानी की कमी
नदियों को भी हुई
पानी की कमी
लाया बसंत
हर वृक्ष के वास्ते
नई पौशाक
हर वृक्ष के वास्ते
नई पौशाक
बारिश पड़ी
उठा धरा घूँघट
झाँका अंकुर
उठा धरा घूँघट
झाँका अंकुर
बन के काल
आया है जंगल में
लक्कड़हारा
आया है जंगल में
लक्कड़हारा
वर्षा जो गिरी
पेड़ों पर लटकीं
बूंदों की लड़ी
पेड़ों पर लटकीं
बूंदों की लड़ी
आई शहर
गाँव की पगडण्डी
हस्ती ही खो दी
गाँव की पगडण्डी
हस्ती ही खो दी
आंधी तूफ़ान
उड़ा गरीब झुग्गी
रोये बहुत
उड़ा गरीब झुग्गी
रोये बहुत
लाँघी है सीमा
जब जब नदी ने
आया सैलाब
जब जब नदी ने
आया सैलाब
बूढा दरख़्त
चाहे फल नहीं दे
छाँव तो देगा
चाहे फल नहीं दे
छाँव तो देगा
चाँद बहाये
चाँदनी की नदिया
रात नहाये
चाँदनी की नदिया
रात नहाये
जीत के हारी
सिंधु से मिल नदी
हो गई खारी
सिंधु से मिल नदी
हो गई खारी
आया चुगने
सूरज राजहंस
ओस के मोती
सूरज राजहंस
ओस के मोती
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