Sunday, 3 July 2016

वर्षा दुल्हन
बैठी मेघ पालकी
हवा कहार

बूँद की आस
आयी मेघ पालकी
करे निराश

होठों का स्पर्श
वो तेरा एहसास
बढ़ाता प्यास

तेरा वो स्पर्श
डाल गया फफोले
दिल पे मेरे

तुलसी तले
क्यों जलें नहीं अब
दीप घरों में

रोक लेते हैं 
उदासियों की धूप
यादों के पर्दे

क्षितिज पार 
ये अद्भुत मिलन
धरा रवि का

ढहा देती हैं 
हकीकती आंधियां 
ख्वाबों के किले

सांझ सलोनी 
लगा मांग सिन्दूर 
सजाये ख्वाब

किसी को खुशी 
और गम किसी को 
वर्षा ने दिये

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