Monday, 4 July 2016

थका सूरज
उतारता थकान
नदी मे नहा

सांझ की बेला
लौट रहे परिंदे
लगा है मेला

गोधूली बेला
थका हुआ सूरज
सोने को चला

लौटे परिंदे
दरख्तों की शाखाएँ
ख़ुशी से झूमें

सिंदूरी शाम
लिए रक्तिम आभा
खड़ा पलाश

दिन जो ढला
छोड़ धरती उडी
धूप की चिड़ी

No comments:

Post a Comment