थका सूरज
उतारता थकान
नदी मे नहा
सांझ की बेला
लौट रहे परिंदे
लगा है मेला
गोधूली बेला
थका हुआ सूरज
सोने को चला
लौटे परिंदे
दरख्तों की शाखाएँ
ख़ुशी से झूमें
सिंदूरी शाम
लिए रक्तिम आभा
खड़ा पलाश
दिन जो ढला
छोड़ धरती उडी
धूप की चिड़ी
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