साँसों की तार
दिखाए करतब
ज़िंदगी नटी
पेड़ जो कटा
छाया का उस दिन
आँचल फटा
समन्द्र नहीं
एक बूँद नदी की
प्यासा चाहता
शक धागों में
उलझ कर गिरा
टूटा यकीन
दिखाए करतब
ज़िंदगी नटी
पेड़ जो कटा
छाया का उस दिन
आँचल फटा
समन्द्र नहीं
एक बूँद नदी की
प्यासा चाहता
शक धागों में
उलझ कर गिरा
टूटा यकीन
रवि जुलाहा
किरणों के धागे से
बुने उजाला ।
भोर ने धोई
रजनी की कालस
फैला उजास ।
सूखा है कुआँ
पनघट उदास
है जेठ मास ।
लगते अच्छे
कड़कती धूप में
छाँव के धब्बे ।
करे आराम
चितकबरी धूप
पेड़ों के नीचे।
ढला जो दिन
धरती छोड़ उड़ी
धूप की चिडी ।
जल -समाधि
ले रहा सागर में
थका सूरज ।
लौटे परिंदे
दरख्तों की शाखाएँ
खुशी से झूमीं ।
बेचता तारे
चंद्रमा नभ पर
बिछा के रात।
व्योम की शय्या
ओढ़कर बादल
सूरज सोया ।
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