सूरज दूल्हा
खड़ा लिए सिंदूर
सांझ के द्वार
सजी है भोर
माथे सूरज बिंदी
मांग सिंदूर
कमल लाल
ज्यों लगा हो सिंदूर
झील के भाल
दुल्हन बनी
सजा माथे सिंदूर
मिला संसार
चली बन्दूक
बह गया सिन्दूर
बन के खून
No comments:
Post a Comment